आओ
फिर चलें ख़्वाबों के उस भंवर
में, जहाँ हो बस तुम
और मैं
चलो
फिर चलें उन् खुली हवाओं
में, और लिखें कुछ
अफ़साने रेत पे
उन्
सपनों की दुनिया में,
जहां वक़्त का कोई तक़ाज़ा
न हो
बस
तुम हो और मैं
हूँ और हमारे कुछ
जज़्बात हों
क्यों
खो गए हैं हम
इस दुनियादारी में
क्यों
छूट गए हैं हम
इन् चार दीवारों में
क्यों
न आज हम फिर
थोड़ा खुल के जीयें
क्यों
न आज हम फिर
खुद को आज़माएं
जानते
हो, मेरी ख़्वाबों की दुनिया में,
एक छोटी सी चिड़िया आई
है
धीमे
से आकर उसने कुछ
मधुर सा, एक गीत सुनाया
है
आओ
न उसे हम भी
गुनगुनायें
थोड़ा
हसें, थोड़ा मुस्कुराएं और थोड़ा सा
चहक लें
क्या
तुमने महसूस किया, इन हवाओं की खुशबुओं को
क्या तुमने
देखा उस उड़ती हुई तितली के परों को
चलो
न आज हम इन्
लम्हों को चुरा लें
और कैद कर
इन्हें, अपने साथ लम्बी उड़ान भरें

